ताजा अध्ययन में मंगल की सतह पर मिले पानी रिसाव के साक्ष्य

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अलीगढ़ । हैरी एस्ट्रोनॉमी क्लब की मासिक अध्ययन रिपोर्ट पर चर्चा करने के उद्देश्य से प्रधान कार्यालय पर संजय खत्री की अध्यक्षता में बैठक का आयोजन किया गया।
संस्था के प्रवक्ता रंजन राना ने अध्ययन रिपोर्ट का सार स्पष्ट करते हुए बताया कि अब तक मंगल ग्रह पर “नासा” द्वारा संचालित सभी मिशन यह दावा करते हुए प्रतीत होते हैं कि मंगल ग्रह की सतह से प्राप्त छाया-चित्रों में नज़र आने वाले प्रवाह क्षेत्र जो सैकड़ों किलोमीटर लम्बे व चौड़े हैं। वास्तव में “ज्वालामुखी लावा” के कारण अस्तित्व में आए हैं, जो नदियों व नहरों के रुप में प्रतीत होते हैं और भ्रम पैदा करते हैं।
परन्तु,… 18 मई 2020 को एक संयुक्त अनुसंधान की ताज़ा रिपोर्ट ने हमें नये सिरे से सोचने समझने पर विवश कर दिया है,इस अनुसंधान में चेक गणराज्य एकेडमी ऑफ साइंस के भू-भौतिकी विभाग द्वारा, लंकेस्टर विश्वविद्यालय, यूनाइटेड किंगडम की रदरफोर्ड एपलटन प्रयोगशाला, फ्रांस से सी.एन.आर.एस, जर्मनी से डी.एल.आर और मोंस्टर विश्वविद्यालय तथा नार्वे से सी.ई.ई.डी ….. शामिल हुए और यूके की ओपन यूनिवर्सिटी प्रांगण में “वैक्यूम चेंबर” (निर्वात कक्ष) का निर्माण किया गया, जिसमें मंगल ग्रह पर पाए जाने वाले वातावरण के अनुसार कम दबाव और बेहद ठंडे तापमान (लगभग — 20 डिग्री सेल्सियस) की स्थिति को पैदा किया गया और पृथ्वी पर पाए जाने वाले साधारण तापमान के सापेक्ष एक तुलनात्मक अध्ययन किया गया। जिसमें नाम मिट्टी (गीली मिट्टी) को प्रवाहित किया गया और देखा गया कि पृथ्वी के सापेक्ष मंगल ग्रह के वातावरण में मिट्टी का प्रवाह मंद गति के साथ बहते हुए विभिन्न आकृतियों को बनाते हुए कुछ सीमित क्षेत्र तक ही रहा और वह आकृतियां भी बेहद ठंडे तापमान के कारण तत्काल जम रही थी, यह आकृतियां ठीक उसी प्रकार से निर्मित हुईं, जो कि हमें नासा द्वारा प्रेषित मंगल ग्रह अभियानों से प्राप्त चित्रों में दिखाई देती हैं।

…. तत्पश्चात समस्त वैज्ञानिक समूह ने बताया कि मंगल ग्रह पर देखने वाले प्रवाह क्षेत्र “ज्वालामुखी लावा” से निर्मित नहीं है, बल्कि यह प्रवाह क्षेत्र बहती हुई “कीचड़” के हैं जो इस ओर इशारा करते हैं कि मंगल ग्रह की सतह पर “जल का रिसाव” हो रहा है और वहां की मिट्टी के साथ मिलकर कीचड़ उत्पन्न हो रही है, जो हमें बहते हुए प्रवाह क्षेत्र में दिखाई प्रतीत होती है, यह इस बात को और अधिक बल देता है कि मंगल ग्रह पर उसकी सतह के नीचे प्रचुर मात्रा में “जल” मौजूद है और यह भी संभव है कि ऊपरी सतह के नीचे “सूक्ष्म जीवाणु” भी पनप रहे हो!
मनुष्य द्वारा भविष्य में मंगल ग्रह पर बस्ती बसाई जाने की कल्पना को जल की मौजूदगी से और बल मिला है तथा दुनिया भर के वैज्ञानिकों को आकर्षित किया है कि अब वे सभी मंगल ग्रह के प्रति नए नजरिए से शोध कार्य संचालित करेंगें।
इस अवसर पर जयकिशन दिक्षित, कार्मिन, दुष्यंत गौड़, समीर, दिलीप कुमार तथा संजीव खत्री उपस्थित रहे।


रंजन राणा
प्रवक्ता
हैरी एस्ट्रोनॉमी क्लब
8923471981

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